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मर्यादा की वेदी – मुंशी प्रेमचंद ( Maryada ki Vedi – Munshi Premchand)

मर्यादा की वेदी – मुंशी प्रेमचंद ( Maryada ki Vedi – Munshi Premchand) मर्यादा की वेदी यह वह समय था जब चित्तौड़ में मृदुभाषिणी मीरा प्यारी आत्माओं को ईश्वर-प्रेम के प्याले पिलाती थी। रणछोड़ जी के मंदिर में जब भक्ति…

नमक का दारोगा – मुंशी प्रेमचंद (Namak ka Daroga – Munshi Premchand)

नमक का दारोगा – मुंशी प्रेमचंद ( Namak ka Daroga – Munshi Premchand) नमक का दारोगा जब नमक का नया विभाग बना और ईश्वरप्रदत्त वस्तु के व्यवहार करने का निषेध हो गया तो लोग चोरी-छिपे इसका व्यापार करने लगे। अनेक…

मुक्तिधन – मुंशी प्रेमचंद ( Muktidhan – Munshi Premchand)

मुक्तिधन – मुंशी प्रेमचंद ( Muktidhan – Munshi Premchand) मुक्तिधन भारतवर्ष में जितने व्यवसाय हैं, उन सबमें लेन-देन का व्यवसाय सबसे लाभदायक है। आम तौर पर सूद की दर 25 रु. सैकड़ा सालाना है। प्रचुर स्थावर या जंगम सम्पत्ति पर…

धिक्कार – मुंशी प्रेमचंद ( Dhikkar – Munshi Premchand)

धिक्कार – मुंशी प्रेमचंद ( Dhikkar – Munshi Premchand) धिक्कार ईरान और यूनान में घोर संग्राम हो रहा था। ईरानी दिन-दिन बढ़ते जाते थे और यूनान के लिए संकट का सामना था। देश के सारे व्यवसाय बंद हो गये थे,…

विषम समस्या – मुंशी प्रेमचंद ( Visham Samashya – Munshi Premchand)

विषम समस्या – मुंशी प्रेमचंद (Visham Samashya – Munshi Premchand) विषम समस्या मेरे दफ्तर में चार चपरासी थे, उनमें एक का नाम गरीब था। बहुत ही सीधा, बड़ा आज्ञाकारी, अपने काम में चौकस रहनेवाला, घुड़कियाँ खाकर चुप रह जानेवाला। यथा…

लैला – मुंशी प्रेमचंद ( Laila – Munshi Premchand) – Part 2

लैला – मुंशी प्रेमचंद ( Laila – Munshi Premchand) Part 2 6 सहसा राज-भवन के द्वार पर शोर मचने लगा। एक क्षण में मालूम हुआ कि जनता का टिड्डी दल, अस्त्र-शस्त्र से सुसज्जित, राजद्वार पर खड़ा दीवारों को तोड़ने की…

लैला – मुंशी प्रेमचंद ( Laila – Munshi Premchand)

लैला – मुंशी प्रेमचंद ( Laila – Munshi Premchand) लैला यह कोई न जानता था कि लैला कौन है, कहाँ से आयी है और क्या करती है। एक दिन लोगों ने एक अनुपम सुंदरी को तेहरान के चौक में अपने…

गरीब की हाय – मुंशी प्रेमचंद ( Gareeb ki Haye – Munshi Premchand)

गरीब की हाय – मुंशी प्रेमचंद ( Gareeb ki Haye – Munshi Premchand) गरीब की हाय मुंशी रामसेवक भौंहे चढ़ाए हुए घर से निकले और बोले- ‘इस जीने से तो मरना भला है।’ मृत्यु को प्रायः इस तरह के जितने…

ज्वालामुखी – मुंशी प्रेमचंद ( Jwalamukhi – Munshi Premchand)

ज्वालामुखी – मुंशी प्रेमचंद ( Jwalamukhi – Munshi Premchand) ज्वालामुखी डिग्री लेने के बाद मैं नित्य लाइब्रेरी जाया करता। पत्रों या किताबों का अवलोकन करने के लिए नहीं। किताबों को तो मैंने न छूने की कसम खा ली थी। जिस…

शांति – मुंशी प्रेमचंद ( Shanti – Munshi Premchand)

शांति – मुंशी प्रेमचंद ( Shanti – Munshi Premchand) शांति जब मैं ससुराल आयी, तो बिलकुल फूहड़ थी। न पहनने-ओढ़ने का सलीका, न बातचीत करने का ढंग। सिर उठा कर किसी से बातचीत न कर सकती थी। आँखें अपने आप…

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